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| 1. | आसफ़ का ज़बूर। अल्लाह इलाही मजलिस में खड़ा है, माबूदों के दर्मियान वह अदालत करता है, |
| 2. | “तुम कब तक अदालत में ग़लत फ़ैसले करके बेदीनों की जानिबदारी करोगे? (सिलाह) |
| 3. | पस्तहालों और यतीमों का इन्साफ़ करो, मुसीबतज़दों और ज़रूरतमन्दों के हुक़ूक़ क़ाइम रखो। |
| 4. | पस्तहालों और ग़रीबों को बचा कर बेदीनों के हाथ से छुड़ाओ।” |
| 5. | लेकिन वह कुछ नहीं जानते, उन्हें समझ ही नहीं आती। वह तारीकी में टटोल टटोल कर घूमते फिरते हैं जबकि ज़मीन की तमाम बुन्यादें झूमने लगी हैं। |
| 6. | बेशक मैं ने कहा, “तुम ख़ुदा हो, सब अल्लाह तआला के फ़र्ज़न्द हो। |
| 7. | लेकिन तुम फ़ानी इन्सान की तरह मर जाओगे, तुम दीगर हुक्मरानों की तरह गिर जाओगे।” |
| 8. | ऐ अल्लाह, उठ कर ज़मीन की अदालत कर! क्यूँकि तमाम अक़्वाम तेरी ही मौरूसी मिल्कियत हैं। |
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